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पढ़े फारसी बेचे तेल

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मित्रों, जबसे १९९१ में भारत में आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत हुई तभी से देश में रोजगाररहित विकास के आरोप लगते रहे हैं हालाँकि इस दौरान देश की जीडीपी में तीव्र और अभूतपूर्व वृद्धि देखने को मिली है. २०१४ में जब नरेन्द्र मोदी की सरकार सत्ता पर काबिज हुई तो इस वादे के साथ कि वो हर साल १ करोड़ लोगों को रोजगार देगी. लेकिन अब तक इस दिशा में जो काम हुआ है वो कहीं से भी सराहनीय या संतोषजनक नहीं कहा जा सकता. तथापि अगर प्रति वर्ष १ करोड़ रोजगारों का सृजन कर भी लिया जाता है तो भी बेरोजगारी बढ़ेगी ही क्योंकि खुद केंद्र सरकार के आकंडे बताते हैं कि तेज जनसंख्या-वृद्धि के चलते देश में हर साल १२ मिलियन यानि १ करोड़ २० लाख नए श्रमिक जुड़ रहे हैं.

मित्रों, सीआईआई के अनुसार, वित्त वर्ष 2012 से 2016 के बीच भारत में रोजगार के 1.46 करोड़ मौके बने थे. यानी हर साल 36.5 लाख अवसर. साल 2016 की श्रम मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, बावजूद इसके पिछले सात सालों में टेक्सटाइल्स और आॅटोमोबाइल सहित आठ सेक्टर में रोजगार सृजन सबसे धीमा रहा है।

मित्रों, प्रौद्योगिकी में उभरती तकनीकी के चलते भी नौकरियों में गिरावट देखने को मिली है। मैककिंसे एंड कंपनी की एक रिसर्च आर्म्स ने 46 देशों में 800 से अधिक व्यवसायों को रिकवर किया, जिसके अनुसार 2030 तक दुनियाभर के कुल 800 मिलियन श्रमिक रोबोट और आॅटोमेटेड तकनीक के चलते अपनी नौकरियां खो सकते हैं। यह संख्या पूरी दुनिया के मजदूरों का पांचवा हिस्सा है. देश की सबसे बड़ी भर्ती कंपनी टीमलीज सर्विसेज लिमिटेड के मुताबिक रोबोटिक्स के चलते पिछले साल की तुलना भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के जॉब्स में 30 से 40 फीसदी की कमी देखी जा सकती है। साथ ही नोटबंदी और जीएसटी के चलते भी बहुत-से लघु और माध्यम उद्योग बंद हो गए हैं. उदाहरण के लिए सूरत के साड़ी और हीरा उद्योग, कानपुर के चमड़ा उद्योग, भदोही के कालीन उद्योग, लुधियाना के रेडीमेड-वस्त्र उद्योग, मुरादाबाद के पीतल उद्योग, फिरोजाबाद के चूड़ी उद्योग और अलीगढ के ताला उद्योग से जुड़ी कई फैक्ट्रियों पर ताले लग चुके हैं. यहाँ मैं आपको बता दूं कि लघु और माध्यम उद्योग कृषि के बाद भारत में सबसे ज्यादा रोजगार देनेवाला क्षेत्र है और इसमें लगभग ४५ करोड़ लोगों को रोजगार मिला हुआ है. साथ ही भारत के सकल घरेलू उत्पाद में इसकी हिस्सेदारी भी ४५ प्रतिशत की है.

मित्रों, अगस्त महीने में, औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग द्वारा जारी एक परिपत्र में कहा गया है कि भारत को भविष्य के लिए एक नई औद्योगिक नीति बनाने की जरूरत है, ताकि देश में प्रतिवर्ष कम से कम 100 अरब डॉलर की एफडीआई आकर्षित की जा सके। इस परिपत्र में यह दर्शाया गया है कि भारत में रोजगार सृजन ग्रोथ बिल्कुल धीमी है। इस नई औद्योगिक नीति के लिए केंद्र सरकार ने एक टास्क फ़ोर्स गठित किया है।

मित्रों, आर्थिक वृद्धि के साथ रोजगार के मौके बनने की रफ्तार बढ़ाने के लिए नीति आयोग ने भी तीन साल का एक ऐक्शन प्लान पेश किया है, जिसमें विभिन्न सेक्टरों में रोजगार सृजित करने की बात की गई है.

मित्रों, देखना यह है कि सरकार २०१९ तक सिर्फ योजनाएं और टास्क फ़ोर्स ही बनाती रहती है या फिर इस दिशा में धरातल पर कुछ काम भी होता है? वास्तव में संघ सरकार की असली परीक्षा इसी मोर्चे पर होनेवाली है. कल की तिमाही रिपोर्ट में जीडीपी भले ही उड़ान भर रही हो लेकिन इस समय पूरे भारत में रोजगार के क्षेत्र में मंदी है क्योंकि जिन क्षेत्रों में वृद्धि के चलते जीडीपी ने गति पकड़ी है उनमें रोजगार-सृजन न के बराबर है.

मित्रों, पढ़े फारसी बेचे तेलवाली कहावत यक़ीनन आपने भी सुनी होगी. हम पर तो यह बखूबी चरितार्थ भी हो रही है. आज ही मैंने हाजीपुर में ५००० रूपये मासिक पर नौकरी पकड़ी है बैठे से बेगारी भला. वैसे अगर भाजपा यूपी निकाय चुनाव जीतने के बाद इस मुगालते में है कि नोटबंदी और जीएसटी के बावजूद जैसे उसने यह चुनाव जीत लिया वैसे ही लोकसभा चुनाव भी आसानी से और प्रचंड बहुमत-से जीत जाएगी भले ही बेरोजगारी कम होने के बदले पहले से भी ज्यादा हो जाए तो निश्चित रूप से वो गलत है और इस दिशा में उसे परिणामात्मक कार्य करके दिखाना ही होगा वो भी २०२२ नहीं बल्कि २०१९ तक.



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