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मालदा से जयपुर वाया पंचकुला

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मित्रों, कार्ल मार्क्स ने कहा था कि “Religion is the sigh of the oppressed creature, the heart of a heartless world, and the soul of soulless conditions. It is the opium of the people”. यानि संप्रदाय अफीम है. यह बात अलग है कि हमारे देश के मार्क्सवादी बुद्धिजीवियों ने इसको धर्म अफीम है बना डाला जबकि धर्म का मतलब ड्यूटी होता है संप्रदाय नहीं. चूंकि हिन्दू धर्म है संप्रदाय नहीं शायद इसलिए मार्क्सवादियों को ऐसी शरारत करनी पड़ी. अब चूंकि हिन्दू धर्म है अर्थात नैतिक नियमों का महासागर है इसलिए इसमें कट्टरता का नामोनिशान नहीं है. हमारे किसी भी शास्त्र या पुस्तक में यह नहीं लिखा है कि जो अहिंदू हैं उनसे नफरत करो, लूट लो, उनके साथ बलात्कार करो या उनको मार डालो या उनको बंदी बना लो. बल्कि दुनिया में हमीं ऐसे अकेले हैं जो कहते हैं कि तू वसुधैव कुटुम्बकम या सर्वे भवन्तु सुखिनः या ब्रह्मास्मि तत त्वमसि.
मित्रों, यही कारण है कि जब १९४७ में भारत का संप्रदाय के आधार पर बंटवारा हुआ तो बड़ी संख्या में मुसलमानों ने नए मुस्लिम देश पाकिस्तान जाने के बदले हिंदुस्तान में हिन्दुओं के बीच रहना बेहतर समझा. यह आबादी इतनी बड़ी थी कि आज पाकिस्तान से ज्यादा मुसलमान भारत रहते हैं. फिर आया १९७१. भारत को बेवजह पाकिस्तान से युद्ध करना पड़ा. युद्ध के दौरान भारी संख्या में बंगलादेशी भागकर भारत आ गए. इनमें से भी ९० प्रतिशत से ज्यादा मुस्लमान थे. इनकी आबादी इतनी तेजी से बढ़ी कि भारत के कई राज्यों और महानगरों में ये कानून और व्यवस्था के लिए समस्या बन गए. सबसे बड़ी बात यह थी कि ये आसानी से स्थानीय मुस्लिम आबादी से घुल-मिल गए और वैश्विक इस्लामिक भाईचारा का हिस्सा बन गए. कथित धर्मनिरपेक्ष दलों के तुष्टिकरण ने दुनिया के इस सबसे कट्टर और हिंसक संप्रदाय के साहस को इतना बढाया कि इन्होंने पहले १९९३ में मुम्बई में एक साथ दर्जनों स्थानों पर बम विस्फोट कर हजारों लोगों की हत्या कर दी फिर २००२ में ट्रेन में आग लगाकर कई दर्जन हिन्दू तीर्थयात्रियों को सिर्फ इसलिए जिंदा जला दिया क्योंकि वे हिन्दू थे.
मित्रों, पिछले कुछ महीनों से जबसे संघ में मोदी सरकार आई है सुभाष और विवेकानंद की धरती पश्चिम बंगाल के मुसलमानों का जेहादी खून हिलोरे मारने लगा है. मालदा से शुरू हुई आगजनी, लूटपाट और दंगे पूरे बंगाल में फ़ैल रहे हैं और वो भी प्रशासनिक संरक्षण में. उधर म्यामार में हिंसा हो रही है तो वहां के मुसलमान भी भारत आ रहे हैं लेकिन सवाल उठता है कि बंगाल या भारत के अन्य हिस्सों से जिन हिन्दुओं को भगाया जा रहा है वे भाग कर किस देश में जाएंगे? मुसलमानों के तो ५६ देश हैं हिन्दुओं का कोई दूसरा देश तो है नहीं. नेपाल है भी तो बहुत छोटा है.
मित्रों, इस बीच एक और शहर है जो सांप्रदायिक हिंसा की आग में जला है और वो है हरियाणा का पंचकुला. वहां कुछ हिन्दू और सिख एक पथभ्रष्ट शैतान जो खुद को ईन्सान कहता था के बहकावे में आ गए और शहर को जलाने लगे. फिर तो प्रशासन कहर बनकर टूट पड़ा. देखते-२ कई दर्जन उपद्रवी मिट्टी के ढेर में बदल दिए गए. सरकार ने स्पष्ट घोषणा कर दी कि किसी भी मृतक के परिजन को मुआवजा नहीं मिलेगा. इतना ही नहीं हंगामे से हुए नुकसान की भरपाई डेरा की संपत्ति बेचकर की जाएगी. किसी भी हिन्दू या सिख ने विरोध भी नहीं किया.
मित्रों, अब हमारी दंगा एक्सप्रेस आ पहुंची है जयपुर. वीरों की धरती राजस्थान की राजधानी जयपुर. यहाँ पुलिस का डंडा कथित रूप से गलती से एक मुस्लिम बाईक सवार को लग जाती है जिससे वो गाड़ी सहित गिर जाता है. गाड़ी पर उसकी पत्नी और बच्चे भी होते हैं. फिर आनन-फानन में हजारों मुसलमान थाने पर हमला बोल देते हैं और पूरे शहर में आगजनी शुरू कर देते हैं. ड्रोन से लिए गए चित्र बताते हैं कि मुसलमानों ने दंगों की तैयारी पहले से ही कर रखी थी. एक मुसलमान इसमें मारा जाता है लेकिन परिजन लाश लेने से इंकार कर जाते हैं. राजस्थान सरकार के मानों हाथ-पांव फूल जाते हैं और वो मृतक के परिजनों से समझौता-वार्ता करती है. फिर करार होता है कि सरकार उस महान हिंसक उपद्रवी के परिजनों को १० लाख रूपये और एक नौकरी देगी. इसी दंगे में एक दिव्यांग हिन्दू ऑटो चालक भी मारा जाता है लेकिन प्रशासन उसकी लाश को छिपा जाती है. बाद में उसके परिजन भी लाश लेने से मना करते हैं लेकिन उनके साथ कोई समझौता नहीं किया जाता. उसके परिजनों को न तो १० लाख रूपये ही दिए जाते हैं और न तो नौकरी ही. बाद में मीडिया में किरकिरी होने पर घोषणा की जाती है कि उसके परिजनों को भी वही सब मिलेगा जो आदिल के परिवार को दिया जाएगा. इतना ही नहीं यहाँ संपत्ति की भरपाई दंगा करनेवालों से भी नहीं करवाई जाती.
मित्रों, आपको याद होगा कि सोनिया-मनमोहन कीQ सरकार जो साम्प्रदायिकता अधिनियम लाने पर विचार कर रही थी उसमें भी कुछ ऐसे ही भेदभावकारी प्रावधान थे. कि दंगों के लिए हमेशा हिन्दू ही दोषी माने जाएँगे,मुआवजा सिर्फ मुसलमानों को मिलेगा आदि. तब हमारे साथ मिलकर भाजपा ने इसका सख्त विरोध भी किया था. फिर अब भाजपा राजस्थान में अघोषित रूप से उसी अधिनियम को लागू करने पर क्यों आमादा है? ममता ने तो बंगाल में जैसे उसको बहुत पहले से लागू कर रखा है. मगर हमारा सवाल तो भाजपा से है कि क्या भाजपा ने ख़ुदकुशी की पूरी तैयारी कर ली है? मैं आज भी स्टाम्प पर लिख देने को तैयार हूँ कि मुसलमानों ने आज तक भाजपा को न तो कभी वोट दिया है और न ही कभी देंगे फिर महारानी ऐसा क्यों कर रही है जिससे भाजपा का आधार ही समाप्त हो जाए? भाजपा कहती है कि एक देश में २ कानून नहीं चलेगा फिर वो हरियाणा और राजस्थान में अलग-अलग कानून क्यों चला रही है?



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