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राक्षस धर्म और संस्कृति

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मित्रों,हम बचपन से पढ़ते आ रहे हैं कि लम्बे समय तक धरती पर देवों और दानवों में युद्ध होता रहा. दानवों यानि राक्षसों की अपनी संस्कृति थी.वे परपीड़क थे और परपीड़कता ही उनका धर्म था.वे सर्वभक्षी थे यहाँ तक कि नरभक्षी भी थे.वे दुनिया पर जबरदस्ती अपनी संस्कृति थोपना चाहते थे.वैदिक यज्ञों और पूजा-पाठ में बाधा डालते थे और ऋषि-मुनियों की हत्या कर देते थे.परस्त्रियों को अपहृत कर जबरन उनको अपनी पत्नी बना लेते थे.हरिभक्तों को जेलों में बंद कर असीम यातनाएं देते थे.यहाँ तक कि हिरन्यकश्यप ने अपने हरिभक्त बेटे को भी मारने की कोशिश की.हिरन्यकश्यप ने घोषणा कर दी कि वही भगवान है इसलिए केवल उसकी ही पूजा की जाए.अन्य देवी-देवताओं को पूजनेवाले कठोर दंड के भागी होंगे क्योंकि ऐसा करना उसकी नजर में पापकर्म होगा.
मित्रों,वेद-पुराण बताते हैं कि फिर कई उतार-चढाव के बाद अंत में राक्षसों की हार होती है और देव-संस्कृति की स्थापना होती है.हम यह नहीं कहते कि ऐसा होते ही अचानक हमारा सनातन धर्म पूरी तरह से अवगुणरहित हो गया.लेकिन सत्य यह भी है कि हमने बदलते समय के साथ खुद को बदला है.हमने खुले दिल से माना कि हममें कमियां हैं और उनको दूर भी किया और आज भी कर रहे हैं.हमने ऐसा कभी नहीं कहा कि हम तो सिर्फ वही मानेंगे या करेंगे जो इस आसमानी पुस्तक-विशेष में लिखा हुआ है.बल्कि इसके उलट हमने कहा कि एकम सत विप्रा बहुधा वदन्ति और कहा ब्रह्मास्मि तत त्वमसि.उसी तरह ऋग्वेद से लेकर पुरानों और स्मृतियों तक में विभिन्न पशु-पक्षियों को पूज्य कहा गया है.और चूंकि हम मानते हैं कि हर जीव में ईश्वर का वास है या हर जीव ईश्वर का अंश है इसलिए जीवहत्या को भयंकर पाप भी मानते है.हालांकि आज भी कुछ हिन्दू पशुओं की बलि देते हैं लेकिन यह गलत है.हमारा कोई भी शास्त्र इसकी अनुमति नहीं देता और तामसी भोजन को हर दृष्टिकोण से त्याज्य माना जाता है.
मित्रों,यह हमारा दुर्भाग्य है कि समकालीन विश्व में कई ऐसे संप्रदाय मौजूद हैं जिनमें वेद-पुरानों में वर्णित राक्षस-संस्कृति के लक्षण आसानी से देखे जा सकते हैं.वे कुछ भी भक्षण कर जाते हैं.हालाँकि उनमें से ज्यादातर इंसानों पर अत्याचार नहीं करते और अपनी ही दुनिया में मगन रहते हैं.परन्तु एक पंथ ऐसा भी है जिनके चलते पूरी दुनिया में अशांति है और फिर भी वे अपने कथित धर्म को शांति का धर्म बताते हैं.कुरान पढने के बाद मेरी समझ में जो आया है वो यह है कि मोहम्मद साहब मुसलमानों के आपसी झगड़ों से काफी परेशान थे.इसलिए उन्होंने आतंरिक शांति के लिए नए नियमों की घोषणा की और पंथ का नाम इस्लाम यानि शांति रखा.इसका यह मतलब कतई नहीं है कि उन्होंने अपने अनुयायियों से कहा कि दूसरे पंथों का आदर करो और सबके साथ मिलजुलकर रहो.(९.५ फिर जब हराम महीने बीत जाएँ तो बहुदेववादियों की हत्या करो जहाँ पाओ,९.१४ उनसे युद्ध करो अल्लाह तुम्हारे हाथों उनको दंड देगा.४.८९ तुम उनमें से किसी को भी मित्र या सहायक न बनाओ,जहाँ कहीं उनको पाओ उनकी हत्या करो) बल्कि कहा कि उनके अनुसार ईश्वर अतिकठोर ह्रदयवाला है और जो लोग कुरान में विश्वास नहीं रखते या कुरान में दिए गए आदेशों को नहीं मानते उनको खुद या अपने बन्दों के माध्यम से दण्डित करता है.(४७.४ तो अवज्ञाकारियों से तुम्हारी मुठभेड़ हो तो उनकी गर्दन पर मारो.८.४८ मैं अल्लाह से डरता हूँ और अल्लाह कठोर दंड देनेवाला है. ८.५० और यदि तुम देखते जबकि फ़रिश्ते अवज्ञाकारियों के प्राण निकालते हैं,मारते हुए उनके चेहरों और उनकी पीठों पर और यह कहते हुए कि अब जलने की यातना चखो). अल्लाह इतना क्रूर है कि निरीह पशुओं पर भी कृपा नहीं करता.(८.२२ निश्चय ही उसके निकट सबसे बुरे पशु हैं और जो बहरे,गूंगे हैं और बुद्धि से काम नहीं लेते.२.६७ जब मूसा ने अपनी कौम से कहा कि अल्लाह तुमको आदेश देता है कि तुम गाय जबह करो) और हम हिन्दू हैं कि हजार साल से उम्मीद लगाए बैठे हैं कि एक दिन मुसलमान हमारी भावनाओं का आदर करते हुए गाए-बैल खाना बंद कर देंगे.अगर वे ऐसा करेंगे तो कुरान की अवमानना के दोषी नहीं हो जाएंगे और इसके लिए उनका शक्तिशाली और कठोर अल्लाह उनको नरक की आग में नहीं जलाएगा? पता नहीं वह नरक कहाँ है? (5.3 तुम्हारे लिए अवैध किया गया मुर्दा और खून और सूअर का मांस बाँकी सारे पशु-पक्षी-जलजीव तुम्हारे लिए सूथर और हलाल हैं).
मित्रों,कुरान को पढ़कर हमने जाना है कि इस्लाम धर्म नहीं है, सेना है; लुटेरों की सेना जिसको कथित अवज्ञाकारियों से लड़ने के लिए हमेशा तत्पर रहना है (८.६०).तभी तो आठवें अध्याय में विस्तार से अनफ़ाल यानि युद्ध में लूट के माल के बंटवारे की विस्तार से चर्चा की गयी है.(८.४१ और जान लो कि जो कुछ माल-गनीमत तुम्हे प्राप्त हुआ है उसका ५वां भाग अल्लाह और उसके संदेष्टा के लिए है.
६१.११ ऐ ईमानवालों तुम अल्लाह के मार्ग में अपनी संपत्ति और अपनी जान से युद्ध करो).जीत गए तो अल्लाह की जीत और हार गए तो अल्लाह की ईच्छा.जीवित रहते हुए शराब नहीं पीओ लेकिन मरने के बाद तुमको स्वर्ग में शराब की नदियाँ अता की जाएंगी (३७.४५). इसी तरह स्त्रियों को पुरुषों की खेती कहा गया है और विस्तार से निकाह,तलाक और हलाला की चर्चा की गयी है.रक्तसम्बंधियों से विवाह को मान्यता दी गयी है और मेहर अदा करने को कहा गया है जो एक तरह से औरतों की कीमत है.
मित्रों,यहूदी धर्म और ईसाई धर्म भी तो इस्लाम की तरह यहूदी धर्म से ही निकले हैं फिर वे क्यों मेलमिलाप और प्रेम की बात करते हैं.कुरान में कहीं भी प्रेम का जिक्र तक क्यों नहीं है?उत्तर पाने के लिए हमें रामकृष्ण परमहंस के जाना होगा. भक्तप्रवर रामकृष्ण परमहंस ने कहा है कि हम जैसे देवता या भगवान को पूजते हैं खुद भी वैसे ही हो जाते हैं या फिर हम जैसे होते हैं हमारा आराध्य भी वैसा ही होता है.मोहम्मद साहब ने जो व्यवस्था दी वह तत्कालीन अरब की परिस्थितियों के अनुरूप थी.उन्होंने जो देखा,सुना और भोगा वैसा ही अल्लाह गढ़ लिया.कोइ भी किताब आसमानी नहीं हो सकती.कुरान की सीमा और कमियां अल्लाह की सीमा या कमी नहीं है बल्कि मोहम्मद साहब की सीमा या कमी है.अगर कुरान आसमानी होती तो अल्लाह को पता होता कि धरती गोल है न कि चटाई की तरह चपटी,आसमान शून्य है और उसमें कोइ सतह नहीं है,पहाड़ लम्बी भूगर्भीय प्रक्रिया से बने हैं और पूरी दुनिया २ या ४ दिन में नहीं बनी है.कुरान अगर अल्लाहरचित होता तो अल्लाह को पता होता कि आत्मा क्या है और चन्द्रमा का आकार कैसे बढ़ता-घटता है.ग्रहण क्यों लगता है और सूरज धरती का चक्कर नहीं लगाता बल्कि धरती सूरज के चक्कर लगाती है.
मित्रों,मैंने आलेख के शुरू में राक्षसी संस्कृति का जिक्र किया था.क्या इस्लाम और राक्षसी संस्कृति में अद्भुत समानता नहीं है? सवाल उठता है कि क्या इस्लाम को बदला जा सकता है? स्वयं कुरान की मानें तो कदापि नहीं (१०.३७).मगर सवाल उठता है कि लम्बे संघर्ष के बाद इसाई धर्म में बदलाव आ सकता है तो इस्लाम में सुधार क्यों नहीं हो सकता?क्या कारन है कि तुर्की,ईराक,सीरिया,ईरान,अफगानिस्तान,लेबनान,मालदीव आदि देशों में या तो कट्टरपंथी इस्लामिक क्रांति या तो घटित हो चुकी या अभी प्रक्रिया में है?पूरी दुनिया जबकि आगे जा रही है तो मुसलमान पीछे क्यों जा रहे?आखिर १४०० साल पहले दी गयी व्यवस्था को आज कैसे लागू किया जा सकता है?परिवर्तन तो संसार का नियम है फिर इस्लाम को क्यों नहीं बदलना चाहिए?क्या इसी तरह से धरती अल्लाह के नाम पर निर्दोष इंसानों और पशुओं के खून से लाल होती रहेगी और काल्पनिक स्वर्ग के लिए वास्तविक स्वर्ग धरती को नरक बना दिया जाएगा.क्या इसी तरह स्त्रियों को हलाला जैसी वेश्यावृत्ति और पर्दा प्रथा को भोगते रहना पड़ेगा.सवाल यह भी उठता है कि जिस तरह का व्यवहार मुसलमान अन्य धर्मावलम्बियों के साथ अपने अल्लाह के नाम पर सीरिया और इराक सहित पूरी दुनिया में कर रहे हैं अगर हम भी उनके साथ अपने भगवान के नाम पर वैसा ही करें तो क्या उनको पसंद आएगा?



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