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कभी-कभी बोलनेवाला रोबोट है मनमोहन सिंह

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manmohan singh

मित्रों,पिछले कुछ महीने भारत के लिए काफी घटनापूर्ण रहे हैं.अप्रैल से ही भारत का प्रबुद्ध वर्ग समय-समय पर भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलित रहा है.कभी अन्ना हजारे के अनशन और बयानों के कारण तो कभी योगगुरु बाबा रामदेव के भ्रष्टाचारियों को शीर्षासन कराने की जिद के चलते.इस बीच सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी के महासचिव दिग्विजय सिंह और केंद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री कपिल सिब्बल सरकार की तरफ से लगातार बयान देते रहे हैं लेकिन सरकार के मुखिया प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस कदर चुप्पी साधे रहे हैं कि हम भारतवासियों को गुमां हो रहा था कि कहीं मिस्टर ऑनेस्ट की आवाज तो नहीं चली गयी है.
मित्रों,मनमोहन जी के राजनैतिक गुरु पी.वी.नरसिंह राव भी बहुत कम बोलते थे लेकिन उन्हें कभी यह स्पष्ट नहीं करना पड़ा कि वे मजबूत प्रधानमंत्री हैं.उनके भ्रष्टाचारपूर्ण कार्यकाल में सत्ता का सिर्फ और सिर्फ एक ही केंद्र था और वह थे स्वयं पी.वी.नरसिंह राव.इसलिए राव साहब ने जो कुछ भी भला-बुरा किया उसकी एकमात्र जिम्मेदारी उनकी खुद की थी.लेकिन इस सरकार में तो सत्ता के बहुत-से केंद्र हैं और अगर कोई केंद्र नहीं है तो वह हैं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह.
मित्रों,कम बोलना अच्छा गुण माना जाता है परन्तु उस शासक के लिए जिस पर पूरे भारत का वर्तमान और भविष्य निर्भर करता है,का पूरी तरह से गूंगा बन जाना और देश में जान-बूझकर भ्रांतिपूर्ण वातावरण बन जाने देना गुण नहीं वरन अवगुण होता है.आखिर सरकार का नेतृत्व मनमोहन सिंह कर रहे हैं न कि कपिल सिब्बल या दिग्विजय सिंह.फिर मनमोहन सिंह ने क्यों नहीं खुद ही इस बात की घोषणा की कि अब सरकार सिविल सोसाईटी को भाव नहीं देगी और मसौदा कमिटी में नहीं रखेगी?क्यों नहीं मनमोहन सिंह ने आगे आकार स्पष्ट किया कि अप्रैल में उनकी सरकार अन्ना के आगे क्यों झुक गयी थी और अब ऐसी कौन-सी गंभीर गलती सिविल सोसाईटी वालों ने कर दी है कि उन्हें मसौदा कमिटी से अलग रखने की बात उनके मंत्री कर रहे हैं?
मित्रों,मनमोहन सिंह को जब-जब कुछ कहना होता है वे साल में एक-दो बार मीडियाकर्मियों से बात कर लेते हैं.उन्हें रोजाना मीडिया से बात करने में क्या परेशानी है?अगर वे पूरी तरह से स्वतंत्र और मजबूत हैं जैसा कि वे बार-बार बेवजह स्पष्ट भी कर रहे हैं तो फिर कंप्यूटरचालित आंसरिंग मशीन की तरह क्यों जवाब देते हैं?उनकी जुबान पर हमेशा रटा-रटाया जवाब क्यों रहता है?ऐसा क्यों होता है कि उनकी शारीरिक भाषा कुछ और कह रही होती है और जुबान कुछ और?
मित्रों,भाषण करना एक कला है,विज्ञान भी है.नेताओं को यह कला आनी ही चाहिए.द ग्रेट नेपोलियन की जीत के पीछे कोई चमत्कार का हाथ नहीं होता था बल्कि उसका पत्थर को भी जागृत कर देनेवाला भाषण होता था.प्रसाद,नेहरु और शास्त्री के भाषणों में भी काफी दम होता था.मनमोहन जी के पूर्ववर्ती अटल बिहारी वाजपेयी भी अपनी भाषण-कला के लिए पूरी दुनिया में जाने जाते थे और भाषण द्वारा वातावरण को पूरी तरह से बदल डालने का माद्दा रखते थे.परन्तु हमारे मनमोहन सिंह साल में एक या दो दिन जब भी जनता को सीधे संबोधित करते हैं टाटा अग्नि चाय पिए हुए लोगों को भी जम्हाई आने लगती है.बोलते समय उनका चेहरा कभी कैमरा-फ्रेंडली नहीं होता.लगता है जैसे कोई ईन्सान नहीं रोबोट बोल रहा है और आप तो जानते हैं कि रोबोट को अपना दिल-दिमाग नहीं होता.जो आदमी अपनी मर्जी से दो-चार बातें तक नहीं बोल सकता उससे हम इस संक्रमण काल में जब देश ड्रैगन के जागने समेत अनगिनत बाह्य और आन्तरिक खतरों से घिरा है;कैसे देश को सफल और सक्षम नेतृत्व देने की उम्मीद कर सकते हैं?
मित्रों,श्रीमान मनमोहन जी से हमारा विनम्र निवेदन है कि आगे से वे प्रेस कांफेरेंस या एडिटर्स मीट का आयोजन करने की कृपा बिलकुल न करें.वे क्या बोलने वाले हैं यह सबको पहले से पता होता है.अगली बार जब कुछ अपने दिलो-दिमाग से बोलना हो तब जरुर वे ऐसी अहैतुकी कृपा कर सकते हैं लेकिन मुझे नहीं लगता कि इस जन्म में वे अपने मन से बिना रिमोट कण्ट्रोल के आदेश के कुछ बोलने वाले हैं.

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3 प्रतिक्रिया

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bharodiya के द्वारा
July 3, 2011

श्रीमान मनमोहन की चोटी चान्डाल चौकडी के हाथ है । ईस चौकडी के सदस्य है सोनिया, चिदम्बरम,कपिल और कई भ्रष्ट मन्त्री. मनमोहन को तो एक सिम्बोल के रूप मे नियुक्त किया गया हे , कुछ करने के लिये नही । पूरी कोन्ग्रेस मे प्रणव बाबु लायक थे ईस पद के लिये । चान्डाल चौकडी जानती थी प्रणव उनकी बाजी पलट देते , वो भारी पडते । उन्हे तो हल्का-सा, फुल्का-सा प्रधान प्रधान मन्त्री चाहिए था जो आज है । मित्र ये आपके कुछ सवाल है । सवाल – मनमोहन सिंह को जब-जब कुछ कहना होता है वे साल में एक-दो बार मीडियाकर्मियों से बात कर लेते हैं.उन्हें रोजाना मीडिया से बात करने में क्या परेशानी है? जवाब – परेशानी सबको है । मनमोहन सिंह की परेशानी है की चान्डाल चौकडी की तरफ से क्या बोलना है वो कागज की चीठ्ठी की राह देखनी पडती है । मीडियाकर्मि भी परेशान है चान्डाल चौकडी कब उन की चीठ्ठी रीलीज करे ईस का इन्तजार करना पडता है । मनमोहन सिंह को चीठ्ठी रटवानी पडती है । कैसे बैठना है, चेहरे के हावभाव कैसे बदनने है, कब रोनी सुरत बनानी है, कब हलका फुलका मेहसुस करना है, वो सब सिखाना पडता है । चान्डाल चौकडी की परेशानी है की प्रेमपत्र मे तो सब अच्छा अच्छा लिखा जता है । हर बार अच्छी बात लाये तो लाये कहासे ? उनके कर्मो की सुची लम्बी होती है, उस मे से कोइ अच्छा कर्म अगर मिल जाये तब वो प्रेमपत्र भेज सकते है । सवाल – अगर वे पूरी तरह से स्वतंत्र और मजबूत हैं जैसा कि वे बार-बार बेवजह स्पष्ट भी कर रहे हैं तो फिर कंप्यूटरचालित आंसरिंग मशीन की तरह क्यों जवाब देते हैं?उनकी जुबान पर हमेशा रटा-रटाया जवाब क्यों रहता है? जवाब – बच्चा होमवर्क मे जो मिला है रटने के लिये वही बोलेगा , यन्त्रवत बोलेगा । ईसमे ईस का कसुर क्या है ? मित्र, आपने खूद ही कहा भाषण एक कला है । लेकिन दोस्त ये कला आज हर विद्वान के पास है । लेकिन सब प्रधान मन्त्री के पद के लायक नही बनते । प्रधान मन्त्री की भाषण कला प्रजा के लिये है , रोजाना काममे के लिये नही । उन का पाला मन्त्रीयो से पडता है, जो भाषणप्रूफ है । उन के उपर भाषण नही ओर्डर किये जाते है । भाषण एक एक्ट्रा क्वोलिटी है । ईस का उपयोग वोट बटोरने होता है या कोइ क्रन्ति के लिये प्रजा को जगाने । ईन से पहले हमारे जीतने भी प्रधान मन्त्री बने वो जमीन से जुडे नेता थे । इन मे से कई विद्वान थे, उन्हे चीठ्ठी की जरूरत नही पडती थी अपने दिल की आवाज बोलते थे । कई ऐसे भी थे वो पूरे विद्वान तो नही थे लेकिन कुशल नेता जरूर थे । उन का भाषण भले कम प्रभावी था लेकिन वो भी उन की दिल की आवाज होती थी । प्रधान मन्त्री को आसमान से टपकाने का रीवाज राजीव गान्धी हुआ लेकिन वो बहुत जलदी लायक हो गये थे अपनी जिम्मेदारी उठाने । उन की आवाज भी उन की अपनी थी । ईस प्रधान मन्त्री को आसमान से टपकाने का मकसद हम जानते है तो उससे हमे कोइ अपेक्षा क्यो ? अच्छा है ईस प्रधान मन्त्री के पास भाषण कला नही है वरना आज कई सरकार के पिठ्ठु पत्रकार भुखो मरते । अपने भाषण से ही प्रजा को गुमराह कर लेता ।

Tamanna के द्वारा
July 2, 2011

अन्ना ने सही कहा था, हमारे प्रधानमंत्री तो अच्छे हैं बस उनका रिमोट कंट्रोल खराब है, बढिय़ा लेख

Dr. SHASHIBHUSHAN के द्वारा
July 2, 2011

और रिमोट कन्ट्रोल में बैटरी इटली की लगती है। ऐसा काठ का मूरत रहा तो क्या, न रहा तो क्या। सच्चाई बयान करने के लिये धन्यवाद।


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